मेरी मोहब्बत का ऐसा अंजाम हमे मंजूर ना था
बेवफा उसे कोई कहे हमे ये मंजूर न था
अहले मोहब्बत में जख्म कितने खाए, गिनना हमे मंजूर ना था
कातिल कहके कोई उसे बुलाये हमारा, ये हमे मंजूर ना था
उसने यू की थी तो नजर-ए-इनायत पर हमे ये मंजूर ना था
संगदिल उसे कह जाये कोई, ये हमे मंजूर ना था
अश्कों के सहारे जिन्दगी गुजर जाए,हमे ये मंजूर ना था
हाथ 'सागर ' उसके आगे फैलाये,हमे ये मंजूर ना था
एक स्वरचित छोटी सी गजल
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