Tuesday, 1 August 2017

37. मेरी एक ग़ज़ल

मेरी मोहब्बत का ऐसा अंजाम हमे मंजूर ना था 
बेवफा उसे कोई कहे हमे ये मंजूर न था 

अहले मोहब्बत में जख्म कितने खाए, गिनना हमे मंजूर ना था 
कातिल कहके कोई उसे बुलाये हमारा, ये हमे मंजूर ना था 

उसने यू की थी तो नजर-ए-इनायत पर हमे ये मंजूर ना था 
संगदिल उसे कह जाये कोई, ये हमे मंजूर ना था 

अश्कों के सहारे जिन्दगी गुजर जाए,हमे ये मंजूर ना था 
हाथ 'सागर ' उसके आगे फैलाये,हमे ये मंजूर ना था




एक स्वरचित छोटी सी गजल 

No comments:

Post a Comment